Sunday, 21 June 2015

जख़्म-


शाम के 7 बज चुके थे ! राज अभी भी कंप्यूटर स्क्रीन पर आँखें गड़ाए बुझे मन से अपने बचपन की तस्वीर जिसमें माँ उसे अपने हाथों से खाना खिला रही होती है को देखे जा रहा था ! यूँ तो राज  वो तस्वीर पहले भी देख चुका था , परन्तु आज जो वो देख पा रहा था शायद ही पहले कभी देख पाया हो ! आज मानो वो तस्वीर राज से बातें कर रही थी !
" चलना नहीं है क्या.... या फिर ऑफिस में ही रात गुज़ारने का इरादा है "-- पास के सीट पर  बैठा अभिषेक ने राज की ओर देखते हुए कहा !
"अरे मैं तो भूल ही गया , हाँ चलता हूँ , बस पांच मिनट और "--राज घबरातें हुए बोला मानो उसकी कोई चोरी पकड़ी गई हो !

हाँ ...हाँ चल मेरे भाई कल फिर ऑफिस आना है..अभिषेक ने कहा !
इंसान का चेहरा उसके दिल का आईना होता है , जिसपर उसके मन की  छवि  स्वतः ही प्रतिविम्बित हो जाती है !
"अरे तुम घबराये से दिख रहे हो तबियत तो ठीक है न, कोई परेशानी तो नहीं "--- अभिषेक ने राज के पास आते हुए पूछा !
नहीं भाई सब ठीक है , बस शिर में थोड़ा दर्द  है--- चलें", राज ने अपनी सीट पर से उठते हुए कहा !

ऑफिस से घर पहुचने  तक राज  उस तस्वीर की धुंधली की यादों में खोया रहा ! घर पहुंचकर  उसने जल्दी से कपड़े बदले और बिस्तर पर बदहवाश लेट गया -- मानो शरीर में कोई शक्ति ही शेष न बची हो ! कुछ देर तक वह यूँ ही लेटा रहा - शांत , निःस्तब्ध !
तभी अचानक उसका ध्यान पास के टेबल पर पड़े आईने पर गई...वह झट से उठकर आईने हो हाथ में लेकर उसमें अपना चेहरा देखने लगा...नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है.!-..वह बेचैन हो उठा... ! कोई समानता तो होगी उस कंप्यूटर में पड़े तस्वीर और इस आईने के आभाषी प्रतिबिम्ब में ! वह कभी अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को साफ करता तो कभी बगल में पड़े तौलिये से आईने को, यहाँ तक की वह पानी से अपने चेहरें को धो कर भी...उन दोनों तस्वीरों में कोई अन्तर्सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाया .!

आज राज के चेहरे पे ये कैसी कालिख लगी थी जो दिखाई तो नहीं देती पर अपने होने का एहसास करा रही थी..!
उदास मन से आईने को टेबल पर पुनः रख कर वो फिर वापस लेट गया..!

तभी अचानक उसके  बगल में पड़े  मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी ...अरे नहीं..! ये तो  स्पैम मैसेज .है ! फिर अचानक वह म्यूजिक स्टोर  में पड़े ---" ये दौलत भी ले लो , ये शोहरत भी .....मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,  वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी ...को प्ले कर देता है ! गजल समाप्त होने पर वह न जाने क्यूँ उठकर एक बार फिर आईने में अपना चेहरा देखता है...अरे यह क्या...  उसे दोनों तस्वीरों में कुछ लकीरें  मिलती हुई प्रतीत हो रही थी !

फिर अचानक वो कमरे का लाइट ऑफ कर पुनः विस्तर पर लेट जाता है ... उसी गजल को रीप्ले कर देता है...दो बार, तीन बार...न जाने कितनी बार राज उसे सुनता है ! जगजीत सिंह की कम्पन भरी आवाज आज उसे कुछ ज्यादा ही सुकून दे रही थी जिसे शायद ही उसने पहले कभी महसूस किया हो !
रात की ख़ामोशी राज को आज डरावनी लग रही थी...एक -एक पल मानो वर्षो के सामान हो ! ऑफिस से लौटकर वह  ठीक से खाना भी तो नहीं खा  पाया था !
क्या मिला मीलों दूर आकर मुझे ? अभावों से जूझते माँ- बाबूजी ने मेरे पालन- पोषण में कभी कोई कमी नहीं होने दी ! अपने निजी आवश्यकताओं में कटौती कर भी जहाँ बाबूजी ने मेरी सारी ख्वाइशें पूरी की वहीँ माँ ने कभी बाबूजी की जेब से चुराकर तो  कभी किसी  पड़ोसन से उधार लेकर  न जाने कितनी बार पढाई के लिए शहर जाते  हुए  सौ- सौ के नोट मेरी जेब में चुपके से डालें ताकि मैं कभी अभाव महसूस न कर सकूँ!
मैट्रिक( दसवीँ) पास करने के दो महीने बाद ही तो मैं आगे की पढाई करने शहर चला आया था ! बारहवीं के बाद मैं पटना चला गया  था..! ग्रेजुएशन , मास्टर और  पत्रकारिता की पढाई करते  कैसे 7 - 8  वर्ष बीत गए , कुछ पता ही नहीं चला ! तत्पश्चात MBA करने के बाद तत्पश्चात दिल्ली आ गया !--- राज  आँखे बंद किये अतीत के चलचित्र देख रहा था !
वर्षों संघर्ष व माँ - बाबूजी के अंतहीन त्याग के बाद कहीं जाकर राज को चंद पैसों की नौकरी मिली थी ! कितनी उत्सुकता से उस दिन उसने  माँ को फ़ोन किया था --- " माँ मैं अधिकारी बन गया , जनसम्पर्क अधिकारी...! जो चाहा था आखिर मैंने  पा ही लिया !"
" हाँ बेटा, ऊपर वाले का  लाख -लाख शुक्र है , तुम्हें तुम्हारी मंजिल मिल गई..! मेरा दिल कहता था तुम जरूर ही सफल होगे "- यह कहते हुए माँ का गला भर आया था !

"अरे माँ क्या ऑफिस है....मानो पांच सितारा होटल हो! मेरे लिए तो यह सपने सच होने जैसा है....और जानती हैं , हमारी  एजेंसी न...देश के टॉप टेन एजेंसियों में से एक है ! हाँ , पैसे अभी थोड़े कम मिलेंगे , पर चिंता की कोई बात नहीं साल -दो साल में वह भी ठीक हो जायेगा ! पहली नौकरी है न --नियम के मुताबिक पहले छह महीने मुझे कोई  छुट्टी नहीं मिलेगी ! खैर चिंता की  कोई बात नहीं ऑफिस से समय मिलते ही मैं आपको रोज फ़ोन कर लिया करूँगा ! "
"और हाँ , एक बात कहना तो भूल ही गया...आप को अब चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है...ठीक है..! सैलरी मिलते ही आप के अकाउंट में पैसे डाल  दिया करूँगा ! मैं जब पहली बार घर आऊंगा न तो आपके के लिए एक प्यारा सा तोहफा  लेकर आऊंगा !
क्या लाऊंगा ...तोहफे में..? .अरे नहीं... वो तो मैं अभी बताने से रहा  ! आप जब मेरे पॉकेट  में चुपके  से  पैसे डाल  दिया करती थी तो , बाबूजी को बताती थी क्या  "..- इतना कहकर राज खिलखिलाकर हंस पड़ा था !
"ठीक है ...ठीक है, समझ गई मैं...तू अब समझदार हो गया है ! अच्छा सुनो..अनजान शहर है न...सो थोड़ा संभल कर...अपना ख्याल रखना , खाना समय से खा लेना ! मैं कल ही मंदिर जा कर देवी माँ को प्रसाद चढ़ा आउंगी, उन्होंने मेरी मन्नत पूरी कर दी..!" - कहते हुए माँ ने फ़ोन रख दिए थे !

समय अपनी गति से बीतता चला गया ! कैसे दिन, महीने ,साल गुजरते चले गए,  कुछ पता ही नहीं चला  ! राज समय के साथ -साथ ऑफिस के कामों में इतना उलझता चला गया कि---कभी -कभी तो माँ से बिना बात किये महीनो गुजर जाते  ! पिछले 5 - 6 वर्षों में राज का मुश्किल से 7 -8 बार ही माँ के पास जाना हो सका और वो भी काफी कम दिनों के लिए !
माँ कभी -कभी प्यार से राज की खिचाई यह कहते हुए कर देती -"अब तो तू मैनेजर हो गया ...तुम्हारे पास माँ के लिए समय ही कहाँ है और ऐसे भी  तू तो शहरी हो गया न , गांव में अब तुझे मन कहाँ लगेगा !"
राज बस झेप कर रह जाता ...करता भी क्या ...भला नौकरी करते हुए वक्त ही कहाँ मिल पाता है !
"आज अचानक ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि सबकुछ छोड़कर पुनः वापस लौट जाऊँ ! कहीं मैं अपने उद्देश्यों से भटक तो नहीं रहा ?  जिन उचाईयों को पाने के लिए मैंने वर्षो संघर्ष किये, उन उचाईयों को पाकर भी आज इतना खालीपन क्यों ? विजेता कहती है दुनिया जिसे , वह इतना अकेला क्यों ? लाखों कि भीड़ में होकर भी  इतना एकाकीपन क्यों ? क्यों....आखिर क्यों ?
मात्र 6 -7 वर्षों  ही तो हुए हैं अभी फिर  इस ऐशो- आराम कि जिंदगी से इतनी नफ़रत क्यों ?....राज कुछ समझ नहीं पा रहा था !
सबकुछ तो है मेरे पास, सारी सुख- सुविधाएँ, सारे साधन, पर्याप्त पैसे , इज्जत -प्रतिष्ठा  जिसे पाना चाहता था वर्षों से ! फिर आज इतनी बेचैनी क्यों ? क्यों आज ऐसा महसूस हो रहा है कि इन सारी उपलब्धियों का कोई मूल्य नहीं ..! जो चाहिए था वो तो मिला ही नहीं !

शायद मैं ऊचाईयां चढ़ते हुए अपने जमीं को भूल गया , भूल गए वो सारे संस्कार जो बचपन में माँ- बाबूजी ने मुझे दिए थे ! इस चमक -दमक कि मायावी दुनिया का मैं भी शिकार हो गया ! शहर के इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी का मैं भी एक हिस्सा मात्र बन कर रह गया !"- राज कि आँखे बंद थी पर उसके दिल में  एक अजीब अन्तरद्वन्द चल रहा था !

हाँ ....मैं इस बात से कदापि इंकार नहीं कर सकता कि मैं खो गया  इस शहर के चकाचौंध में ! मेरा सुकून छीन गया ! स्वछंदता जाती रही ! वो निःस्वार्थ रिश्ते , प्यार, अपनत्व ...सब छीन गया ! वो निश्छल मुस्कान यहाँ किसी के चेहरे पर दिखाई नहीं देती ! व्यावसायिक रिश्ते  मानवीय व निजी रिश्ते पर हावी हो गए !
माँ- बाबूजी न जाने कितनी गलतियों को यूँ ही माफ़ कर दिया करते थे , परन्तु यहाँ तो भूल से कोई गलती हो जाये  तो लोग ऐसा व्यवहार करतें है जैसे आप कोई अपराधी हों ! चंद सिक्कों की खनक ने लोंगो के आँखों पर एक ऐसी  आभासी पट्टी बांध दी जिससे समाज के बुद्धिजीवी और मजदुर वर्ग के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई  जो भरने की जगह नित-प्रति बढती ही जा रही है ! समाज के चंद लोग प्राकृतिक संसाधनो के ठेकेदार बन बैठे !
बचपन में जिस सच को सबसे बड़े धर्म के रूप में हमने देखा था, उसके पालन करने वालों को बेबकूफ कहकर अपमानित किया जाता है ! और तो और झूठी चापलूसी करने वाले को आप नित्य- प्रति पुरस्कृत होते देख सकते हैं ! जिन गन्दी आदतों से बचने की नसीहत बचपन में हमें दी जाती थी , उसे आज फैशन व आधुनिकता से जोड़कर देखा जाता है !आज लोगों की कद का आकलन उनके सत्यता , निष्ठा व ईमानदारी से नहीं अपितु झूठी शानो - शौकत, बनावटीपन व आर्थिक समृद्धि के आधार पर किया जाता है !
कहते हैं , किसी भी समाज का अतीत उसका आईना होता है पर ये हमारा दुर्भाग्य है कि  हम उसमें अपनी छबि देखने के बजाय उसपर कालिख  पोत रहें है !
फिर, मैं भी तो अछूता नहीं रहा , संवेदनाविहीन हो गया मैं भी !  आधुनिकता के चकाचौंध में अँधा हो गया, तभी तो मुझे सच और झूठ का अंतर दिखाई नहीं देता ! चंद सिक्कों की खनक ने मुझे भी बहरा कर दिया ,तभी तो मुझे अभावहीन व  गरीबों की करूण चींखे  सुनाई नहीं देती ! वंचितों को जब अभिमानियों के पैरों तले रौंदा जाता है तब मैं भी तो  गूंगा बना तमाशा देखता रहता हूँ ! आज मेरे हाथ भी तो जरुरतमंदो की सहायता को नहीं उठते !

अरे मुझसे अच्छे तो वो हैं जो किसी एक अंग से अपाहिज है , मेरी तो संवेदना ही लकवाग्रस्त हो गई है ! तभी तो ....आज जब शाम को दुबारा गांव से फ़ोन आया तो मैंने खीझते हुए कहा था --" जिन्दा हूँ अभी, मरा नहीं ! फ़ोन किये जा रही है, जब मैं फ़ोन काट रहा हूँ तो बातें  समझ में क्यों नहीं आती... कि मैं कहीं कुछ काम कर रहा होऊंगा ! पैसे कहीं  पेड़ में नहीं उगते , मेहनत से आते हैं ! आप को बस बीमारियों का बहाना चाहिए ! तंग आ गया हूँ मैं आप कि समस्यायों को सुन- सुनकर ! "
और न जाने क्या- क्या..! राज  गुस्से में बके जा रहा था ...और उस ओर एक अजीब सी ख़ामोशी थी...!
" अब कुछ बोलिए भी ...क्या गूंगी बनी सिर्फ सुन रही हैं "- राज ने चीखते हुए कहा था !

" माँ नहीं...मैं बोल रही हूँ भैया,  सिटी हॉस्पिटल से ....आज दोपहर को सीढ़ियाँ चढ़ते हुए माँ का पैर फिसल गया था ! सिर में गहरी चोट आई है..काफी खून भी निकल चूका है ! डॉक्टरों का कहना है कि ...हालात अच्छे नहीं हैं.." --इतना कहते -कहते निशा ( राज कि छोटी बहन ) फुट-फुट कर रो पड़ी थी !

"हेलो डॉक्टर मैं  राज ...निशा का भाई दिल्ली से बोल रहा हूँ...माँ कैसी हैं, सब ठीक तो है न  ?"
"अरे आप ..जल्द से जल्द फ्लाइट लेकर यहाँ आ जाइये...कंडीशन काफी क्रिटिकल हैं , प्लीज मिस्टर राज . " - यह कहते हुए डॉक्टर ने फ़ोन रख दिए थे !
करीब आज से करीब 8  वर्ष पहले बाबूजी कि अकस्मात्  मृत्यु के बाद गांव के पुराने-बड़े घर में माँ अकेले रह गई थी ! अकेलापन व पारिवारिक दायित्वों के बोझ तले वह असमय ही बूढी हो गई थी ! पर उन्होंने राज को कभी भी इस बात का एहसास तक नहीं होने दिया! जब कभी भी राज से बातें होती वो यह कहकर बातें टाल देती -- अरे चिंता कि कई बात नहीं, बुढ़ापें का शरीर हैं , छोटी- मोटी परेशानियां तो लगी ही रहती हैं !
 यूँ तो घर में किसी चीज कि कमी नहीं थी पर क्या भौतिक सुख ही सब कुछ होता हैं ? कहते हैं न अकेलापन इंसान को भीतर से खोखला कर देता है !
बाबूजी कि मृत्यु के समय  माँ को सँभालते हुए राज ने कहा था -- " आप चिंता मत करें, मैं हूँ न , आप धीरज रखिये !''
पास  खड़े एक सज्जन ने तब कहा था ---" राज , इस बेचारी के जीवन में यह एक ऐसा खालीपन है, जिसे भरना संभव नहीं "-आज मानता हूँ !

कितना गलत था तब मैं.... सोचता था - मैं खूब मेहनत करूँगा  , ढेर सारे पैसे कमाऊँगा ! आखिर, जीवन में  सारी खुशियां पैसे से ही तो खरीदी जा सकती है !सारे दुखों के मूल में गरीबी ही तो है ! ----------रात के 2 बज चुके थे पर राज अब भी यूँ ही आँखे बंद किये अतीत कि यादों में खोया था !

क्या दिया इस शहर ने मुझे ? पैसे...? शोहरत....? इज्जत....? पर कितना कुछ छीन गया मुझसे  ! कितना कुछ खो दिया मैंने ! राज आज अपनी सफलता को ,जैसा कि लोग समझतें है , को विफलता के रूप में देख रहा था ! आज वह बेहद अकेला महसूस कर रहा था !  काश...एक बार माँ से मिल सकूँ.., उनके गले लगकर कह सकूँ ....मुझे माफ़ कर दीजिये प्लीज...अब मैं आप को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा ! अरे जीवन कि असली खुशियां तो आपके चरणो में है..! मैं खो गया था माँ, लाखों कि भीड़ में .!..आप का राज दुनिया जीतने की जिद्द कर बैठा था  !
जिस माँ ने अपने हाथों से खाना खिलाया, आज तुझे दोस्तों के साथ रात -रात भर पार्टियां करतें हुए उन्होंने खाया भी या नहीं पूछने तक कि फुरसत नहीं रहती ? जिन अँगुलियों को पकड़कर तुमने चलना सीखा, उन हाथों को आज तुम्हारे सहारे की जरूरत तुझे इसका भी भान नहीं रहा ? जिनकी  धड़कन तुम्हारे पैरों कि आहट तक पहचान लेती थी, तुम्हें कभी उनके एकाकीपन के दर्द का एहसास तक नहीं हुआ ?

वाह...राज ...वाह...दुनिया जीतने चले थे न.तुम..जीत लिया न ! सफल कहते हो न अपने आप को....अरे अभागे सच तो यह है कि तुम हार गए ..तुमने वो खो दिया है, जिसे दुनिया कि सारी दौलत पाकर भी तुम खरीद नहीं सकते..!
" .नाह्ह्ह्हीईईईईन्न्..नहीं.... चीखते हुए राज अचानक उठ खड़ा हो गया   .....वह चीख मार कर रो पड़ा था ...!

कितना सच है न, इंसान बंद आँखों से कभी -कभी वो देख लेता है जिसे खुली आँखे कभी देख नहीं पाती !
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---गुंजन 

1 comment:

  1. बहुत सुंदर लि‍खा.;मन को छूने वाला

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